सखी री मैं तो पूजन जाऊँ गंगा
हाथ में मेरे कलश विराजे
चुड़ियाँ छन छन बाँह में बाजे
माथे पे बिंदिया लाल चुनरिया
गोटा लगा है सतरंगा
सखी....
सब कहें गंगा दूर बसी हैं
पर मोरे हिरदय आय लगी हैं
मातु पिता सम मुझको प्यारी
करतीं मन मोरा चंगा
सखी....
आरती बंदन पूजन करती
श्रद्धा भक्ति अर्पन करती
सूरज की किरणों की छवि से
बूंद बूंद है रंगा
सखी....
जीवन मृत्यु सभी कुछ जल से
गंगा के आशीष औ फल से
अपना जीवन स्वर्ग बनाऊँ
अब तक था बेरंगा
सखी....
**जिज्ञासा सिंह**
