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मेला में पत्नी का बिछुड़ना (लोकगीत)


मोरी धनियाँ मेला म हेराय गईं ।

अगवा से हम चलैं पीछे मोरी धनियाँ,
न जाने कैसे डगरिया भुलाय गईं ।

पहली बार धना घर से हैं निकरी,
भीर देखते बहुत घबराय गईं ।

नदिया नहरिया धनै बहु भावे
बीच गंगा म डुबकी लगाय गईं ।

लड्डन हलवैया बनावे मिठैया
रसही जलेबी देखि ललचाय गईं ।

खस्ता बसाता उन्हें बहु भावे,
एक दर्जन गपागप खाय गईं ।

सुरमा दुकनियाँ क रहि रहि ताकें,
दाम सुनते बहुत खिसियाय गईं ।

लड़िकन खिलौना सबहि कुछ बेसहैं,
लै के पिपिहिरी वे पीं पीं बजाय गईं ।l

**जिज्ञासा सिंह**
शब्द: अर्थ
धना, धनियाँ: पत्नी
हेराय: खोना, बिछुड़ना
बेसहैं: खरीदना
पिपहिरी: बांसुरी, सींटी के जैसा वाद्ययंत्र
रसही: रसीली
लड़िकन: बच्चे
बसाता: गोलगप्पे