तुम कुंजन में, तुम कानन में
गजानन आय बसो मेरे मन में
एक साधना मन में साधी
प्रीत की डोरी तुमसे बांधी
रहते तुम नैनन में
गजानन आय बसो..
मेरा मन कोरा कागज़ जैसा
ढाल दो प्रभुवर चाहो जैसा
मैं तो पड़ी चरणन में
गजानन आय बसो..
धूल धूसरित काया है ये
जग में व्यापी माया है ये
लिपटी जो कंठन में
गजानन आय बसो..
शीश नवाऊँ, पुष्प चढ़ाऊ
ज्ञान की ज्योति कहाँ से लाऊँ
उलझी इन प्रश्नन में
गजानन आय बसो..
तुमसे है करबद्ध प्रार्थना
छोटी सी है आज कामना
आना इस आँगन में
गजानन आय बसो..
**जिज्ञासा सिंह**