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मेरी सौ सौतानियाँ


तर्ज: नगरी नगरी द्वारे द्वारे ढूँढूँ रे सांवरिया

साजन को घेरे रहती हैं, मेरी सौ सौतनियाँ ।
देख देख मैं जल भुन जाऊँ, सुलगूं बन अगिनियाँ ॥

सुबह सवेरे चाय बनाऊँ, ले के जाऊँ पिय के पास।
देखि देखि सौतन का परचम, मनवा मेरा रहे उदास ॥
अखबारों में मुंडी डारे, हाथ में कितबिया ॥

बगल रखा मोबाइल घन घन,घंटी मारे मिनट मिनट पर ।
सूप्रभात का मैसेज लेके, आवैं गोरी व्हाट्सएप पर ॥
जैसे घूरूँ साजन बोलें, हैं बीमा कंपनियाँ ॥

हाय बेरहम मित्रमंडली, रोज सवेरे आ जाती है ।
अदरक लेमनग्रास की चइया,भरभर के कप पी जाती है॥
गप्प मारते जब वे हँसके, तड़पूँ ज्यों मछरियाँ ॥

पहले पेपर, मित्र थे सौतन, अब मोबाइल फ़ोन है ।
डाटा, नेट ज्यों खत्म हुआ, मुआँ वाई फाई ऑन है।।
फोन टच सहलावें ज़ालिम, लोटे है नागिनियाँ ।।

**जिज्ञासा सिंह**