शारदे मुझको दो वरदान ।।
कल तक मैं भूली भटकी थी,
तुमसे थी अंजान ।।
वीणा पाणिनि तेरी विद्या का,
जग करे बखान ।।
अम्बर से भी ऊँचा मन में,
है तेरा स्थान ।।
मानव ज्ञान तुम्हीं से पाते,
मिट जाता अज्ञान ।।
जिन्हें तुम्हारा मान न भावे,
वे मूरख नादान ।
ज्ञान, धैर्य माँ संयम देना,
मत देना अभिमान ।।
शारदे अब तो दो वरदान ।।
**जिज्ञासा सिंह**