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अँखियाँ भरि भरि जायँ.. लोकगीत

ओ सखी मोरी अँखियाँ 
भरि भरि जायँ । 
बारे पिया की याद में,
मोरी अँखियाँ भरि भरि जायँ ॥

पिया सलोने गए नौकरिया
जब से गए नाहीं दीनी खबरिया
रात दिना मैं राह अगोरूँ
चैन लुटा है जाय ॥
ओ सखी…

प्रीति बिना मोरी सूनी नगरिया
दूर दूर नाहीं दीखें सँवरिया,
कासे कहूँ अब का की सुनूँ मैं
मति मोरी भरमाय ॥
ओ सखी…

बाली उमर की प्रीति अनोखी
मन चंचलता अँखियन सोखी
कौन कहे वो कब आवेंगे
क्षन नाहीं बीते बिताय ॥
ओ सखी...

झूला जो झूलूँ नभ तक जाए
साँझ सुनहरी है मुस्काए 
खग आए सब अपने द्वारे
प्रियतम नाहीं आयँ ॥
ओ सखी…

**जिज्ञासा सिंह**