जच्चा गीत (बच्चे के जन्म का गीत)

मेरी मित्र के दादी बनने पर लिखा गया गीत:

लाल के हुए मेरे लाला, 
पिया जी तुम्हें दादा कहेगा ।
लागे है कृष्ण गोपाला, 
पिया जी तुम्हें दादा कहेगा ।।

भोर में सूरज सा चमकेगा, 
दिन में उजाला करेगा...
पिया जी तुम्हें दादा कहेगा ।

वो गुलशन का फूल होगा, 
खिल के गुलाब सा महकेगा...
पिया जी तुम्हें दादा कहेगा ।

अंबर जैसा ऊँचा होगा, 
चंदा सा चमकेगा....
पिया जी तुम्हें दादा कहेगा ।

अपने घर का राजा होगा, 
शीश मुकुट दमकेगा....
पिया जी तुम्हें दादा कहेगा ।

कान्हा जैसा प्यारा होगा, 
राम सा राजा बनेगा....
पिया जी तुम्हें दादा कहेगा ।

**जिज्ञासा सिंह**

विवाह में प्रकृति का निमंत्रण (अवधी बियाहू गीत)


मेड़े मेड़े घुमि घूमि पौध लगाँवव, पौध जे जाय हरियाय ।
उपरा से झाँकय सुरज की जोतिया, नीचे धराति गरमाय ।।

आओ न सुरजा चौक चढ़ि बैठौ, देहूँ मैं बेनिया डोलाय ।
तपन धुजा की मिटाओ मोरे सुरजा, मेह का दीजो बोलाय ।।

होत भोर मैं सुरजा मनाएंव, सांझ बदरिया डेरा डारि ।
झिनि झिनि बूंदन बरसे बदरिया, घिरि आई कारी अंधियारि ।

आधी रात घन बरसन लागे, बिजुरी कड़के बड़ी जोर ।
भोर भए मोरी भरि गई कियरिया, पनिया भरा है चारिव ओर

खेत मेड़ हरियाय गए राजा, धरती बिहंसि हरसाय ।
अंचरा पसारे रानी सुरजा निहारें, सुरजा बदर छुप जाएं ।।

**जिज्ञासा सिंह**
शब्द: अर्थ 
धराति: धरती 
लगाँवव: लगाना 
हरियाय: हरा होना 
सुरजा: सूरज
बेनिया: हाथ का पंखा
धुजा: शरीर
झिनि झिनि: छोटी छोटी

विवाह गीत..(अवधी बियाहू )



दूर देस मोरी बेटी गई हैं:२
पढ़न बड़ी रे किताब ।
सखी रे कैसे ब्याह रचाऊँ ।।

अट्ठरा बरस बेटी होन को आईं:२
बाबा ने ठाना बियाह ।
सखी रे कैसे ब्याह रचाऊँ ।।

रोय रोय बेटी ने घर भर दीन्हा: २
हम तौ पढ़न दूर जाब ।
सखी रे कैसे ब्याह रचाऊँ ।।

बाप न भेजा औ बाबा न भेजा: २
हम करिके भेजा बिसवास ।
सखी रे कैसे ब्याह रचाऊँ ।।

सबही के बेटी बियहि गईं ससुरे: २
हमरी पढन दूरदेस ।
सखी रे कैसे ब्याह रचाऊँ ।।

कोई मारे बोली तौ कोई ठिठोली: २
करौ जल्दी बेटी बियाह ।
सखी रे कैसे ब्याह रचाऊँ ।।

हम कही बेटी जौ पढ़ि कुछ बनिहैं: २
मिलि जैहैं सुघर दमाद ।
सखी रे फिर ब्याह रचाऊँ ।।

**जिज्ञासा सिंह**
शब्द: अर्थ 
बड़ी किताब: उच्च शिक्षा 
बिसवास: विश्वास 
ठिठोली: मज़ाक़ 
ससुरे: ससुराल 
सुघर: अच्छा, पढ़ा लिखा कमाऊ 

महावर, नाखुर गीत (अवधी लोकगीत)

रगरि रगरि धोवे गोड़ कहारिन,
अरे नाउन आई बोलाइ, रमन जी कै आजु है नाखुर ।।

दूर देस सखि रंग मंगायंव, 
मेहंदी मंगायंव मारवाड़, रमन जी कै आजु है नाखुर ।।

केहू कहे चिरई, तव केहू कहे सुग्गा,
केहू कहे चंदा बनाओ, रमन जी कै आजु है नाखुर ।।

सोनेन की नाऊ लाए हैं नहन्नी,
चांदी सींक सलाई, रमन जी कै आजु है नाखुर ।।

रचि रचि रंग भरे है नउनिया,
मेहंदी लगाई मनुहारि, रमन जी कै आजु है नाखुर ।।

दसरथ दीन्हें हैं अनधन सोनवा, 
कौसल्या मोतियन हार, रमन जी कै आजु है नाखुर ।।

झूमि झूमि नाऊ लेहि बलैया,
नाउन नाचें झलकारि, रमन जी कै आजु है नाखुर ।।

**जिज्ञासा सिंह**
शब्द    अर्थ
रमन जी : भगवान राम
नाखुर :  नाखून कटना
गोड़  :   पैर
चिरई : चिड़िया
सुग्गा : तोता
नहन्नी : नाखून काटने का औजार
बलैया : दुआ, आशीर्वाद
झलकारि : झूम झूम, मगन हो

मेला में पत्नी का बिछुड़ना (लोकगीत)


मोरी धनियाँ मेला म हेराय गईं ।

अगवा से हम चलैं पीछे मोरी धनियाँ,
न जाने कैसे डगरिया भुलाय गईं ।

पहली बार धना घर से हैं निकरी,
भीर देखते बहुत घबराय गईं ।

नदिया नहरिया धनै बहु भावे
बीच गंगा म डुबकी लगाय गईं ।

लड्डन हलवैया बनावे मिठैया
रसही जलेबी देखि ललचाय गईं ।

खस्ता बसाता उन्हें बहु भावे,
एक दर्जन गपागप खाय गईं ।

सुरमा दुकनियाँ क रहि रहि ताकें,
दाम सुनते बहुत खिसियाय गईं ।

लड़िकन खिलौना सबहि कुछ बेसहैं,
लै के पिपिहिरी वे पीं पीं बजाय गईं ।l

**जिज्ञासा सिंह**
शब्द: अर्थ
धना, धनियाँ: पत्नी
हेराय: खोना, बिछुड़ना
बेसहैं: खरीदना
पिपहिरी: बांसुरी, सींटी के जैसा वाद्ययंत्र
रसही: रसीली
लड़िकन: बच्चे
बसाता: गोलगप्पे

विवाह गीत: मंडप छाजन (बियाहू: अवधी)

पनवा औ केलवा के मंड़वा छवैबे, बँसवा के खम्भ गड़ाय रे ।
अमवा की पतिया म बाँधि कलावा, बंदनवार सजाय रे ।।

चारो कोने कलस म नीर भरैबे, गंगा मैया से मंगाय रे ।
कलस के ऊपर चौदिस दियना, देबै सखी आजु बारि रे ।।

आओ कागा आओ नेवत देइ आओ, बिरना का मोरे बोलाय रे ।
पहला नेवत मैंने गनपति दीन्हों, दूजा नैहर भिजवाय रे ।।

तीसरा नेवत सखी टोला परोसी, संग दीन्हों सब रिस्तेदार रे ।
यही रे मांड़व बीच सबही बिठइबे, चंदन तिलक लगाय रे ।।

बर और कन्या बैठें चंदन चौकिया, सब कोई देहि आसीस रे ।
चाँद सुरज जैसी जोड़ी अमर हो, जीयहिं लाख बरीस रे ।।

**जिज्ञासा सिंह**

जोति जले तुलसी छैयाँ

जोति जले तुलसी छैयाँ 
ओ रामा जोत जले है।
जगमग करे है डगरिया
हो रामा गाँव जगे है ।।

पपिहा गावे दादुर गावे,
गीत सुनावे कोयलिया 
ओ रामा मोर नचे है ।।

एकादशी की छाई है तरई,
दूर दिखे है उँजेरिया 
हो रामा चाँद छुपे हैं ।।
 
आओ सखी आओ दियना जराओ,
कटि जाय रैन अँधेरिया
सुरज कहीं दूर बसे हैं ।।

एकहि जोति तिमिर घन काटे,
जैसे अंबर म चँदनिया
हो रामा छाई दिखे है ।।

जोति जले पीपल छैयाँ,
हो रामा जोति जले है ।।

**जिज्ञासा सिंह**