हिंदी पढ़ाओ ( ग्रामीण महिलाओं को समर्पित)


बच्चों को हिन्दी पढ़ाना प्यारी सखियों
भाषा का ज्ञान कराना प्यारी सखियों 

हिंदी के अक्षर समझ नहीं आए 
तो रेखा बना के सिखाना प्यारी सखियों

हिन्दी की मात्रा समझ नहीं आए 
तो शब्दों को बोल सुनाना प्यारी सखियों

हिंदी का व्याकरण समझ नहीं आए
तो चित्र बनाके दिखाना प्यारी सखियों

हिंदी के वाक्य समझ नहीं आए
तो कविता, कहानी सुनाना प्यारी सखियों

हिंदी की गिनती समझ नहीं आए
तो रोज दिनाँक लिखाना प्यारी सखियों

बातचीत करना उन्हें नहीं भाए
तो ये है, अपनी भाषा बताना प्यारी सखियों

बच्चों को हिन्दी पढ़ाना प्यारी सखियों
  
    **जिज्ञासा सिंह**

गजानन आय बसो मेरे मन में


तुम कुंजन में, तुम कानन में
गजानन आय बसो मेरे मन में

एक साधना मन में साधी
प्रीत की डोरी तुमसे बांधी
रहते तुम नैनन में
गजानन आय बसो..

मेरा मन कोरा कागज़ जैसा
ढाल दो प्रभुवर चाहो जैसा
मैं तो पड़ी चरणन में
गजानन आय बसो..

धूल धूसरित काया है ये 
जग में व्यापी माया है ये
लिपटी जो कंठन में
गजानन आय बसो..

शीश नवाऊँ, पुष्प चढ़ाऊ
ज्ञान की ज्योति कहाँ से लाऊँ 
उलझी इन प्रश्नन में
गजानन आय बसो..

तुमसे है करबद्ध प्रार्थना
छोटी सी है आज कामना
आना इस आँगन में
गजानन आय बसो..

**जिज्ञासा सिंह**

नटखट कृष्ण कन्हैया प्यारा


जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएँ 
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नटखट कृष्ण कन्हैया प्यारा
जसुदा माँ का राजदुलारा

जनम लिया वो कारागर में
काली आधी रात प्रहर में
सुंदर नैना वर्ण है कारा

घन बरसात भरी जमुना है
नंद के शीश चढ़े कान्हा है
चरण छुए जमुना जल हारा

गोकुल चले देवकी के सुत
रूप सलोना मोहनि मूरत
जसुदा की आँखों का तारा 

माखन चोर, मटकियाँ फोरी
रास रचावे राधा गोरी
गोकुल जन का प्राण पियारा

धेनु चराई, नाग नथाया
पर्वत एक उँगली पे उठाया
झूम उठा जन जीवन सारा

उस की लीला वो ही जानें
दिखे सदा बस मुरली ताने
मुरलीधर पे ये जग वारा

  **जिज्ञासा सिंह**

हरियाली तीज


चूनरी है हरी पहनी,माँग सेंदुर लगाया है,
मैंने आँखों में अपने आज, वो सुरमा लगाया है ।
जो साजन जी मेरे जाकर, बरेली से ले आए थे, 
औ मोती से जड़ा कंगन, वो जयपुर से मंगाए थे ।।

मेरे माथे सजा झूमर, पिया का जी लुभाता है,
कान में झूलता झाला, गीत यूँ गुनगुनाता है ।
कि प्राणों से पियारी तुम, सखी हो, सहचरी मेरी,
तुम्हारे सामने अर्पण, हमारे प्रेम की ढेरी ।।

वो ढेरी आत्मा के सूत्र को, तुमसे पिरोती है,
प्रेम में डूबकर सजनी, सजन में आज खोती है ।
तीज त्योहार रंगों से, सजाए गोरी का दामन,
सजेगी आज फिर सजनी,सजाएंगे उसे साजन ।।

बड़े अरमान से सासू ने, तोहफ़ा ये दिया मुझको, 
कहा आशीष देकर तुम,बड़ी प्यारी हो हम सबको ।
सदा गौरा के जैसे प्रेम, तुमको दें महाशंकर,
भरा आँचल रहे तेरा, ख़ुशी झूमे तेरे दर पर।। 

**जिज्ञासा सिंह**

सावन के हिंडोले (लोकगीत)


मन मोरा झूला झूले है हिंडोले रे
हिंडोले में हिंडोले में
मन मोरा झूला झूले है हिंडोले रे

अंखियाँ जो मूंदू,सपना मैं देखूँ 
रेशम लगीं डोरी हिंडोले रे
मन मोरा झूला...

माथे पे बिंदिया, कानों में कुंडल
नाक में नथिया डोले रे
मन मोरा झूला....

हरी हरी चुनरी,पहन के निकली
पिया मोरे कानों में बोले रे
मन मोरा झूला...

हर बगिया में देखो झूले पड़े हैं 
मार पेंग नभ छूलें रे
मन मोरा झूला...

सखियाँ सहेली सब दूर खड़ी 
और पिया मोरे संग संग झूले रे

मन मोरा झूला झूले है हिंडोले रे

**जिज्ञासा सिंह** 

चुनरिया धानी लैहौं (कजरी गीत )

आयो सावन मास चुनरिया धानी लैहौं

हरे हरे अम्बर,हरी हरी धरती 
हरे हरे बूँद बदरिया झरती 
कजरी गाय सुनैहौं, चुनरिया धानी...

हरी हरी मेहंदी पीस रचाई 
हरी हरी चुड़ियों से भरी है कलाई
बेसर नाक पहिरिहौं,चुनरिया धानी...

अठरा बरस की मैं  ब्याह के आई
मैं बनी राधा पिया किशन कन्हाई
झूम के रास रचैहौं,चुनरिया धानी...
 
निमिया की डारि पे पड़ गए झूले
रेशम डोरी लागी रंग सजीले  
मारि पेंग नभ छुइहौं,चुनरिया धानी... 

कोई सखी काशी कोई सखी मथुरा
सुधि मोहें आवे लागे न जियरा
पाती भेजु बुलवइहौं,चुनरिया धानी...

अम्मा औ बाबा की याद सतावे
रहि रहि करेजवा में पीर मचावे
बीरन आजु बुलैहौं,चुनरिया धानी...

आयो सावन मास चुनरिया धानी लैहौं...

 **जिज्ञासा सिंह**

बौने पौधे का दर्द (बोनसाई)

मैने गमले में बगिया लगाई
एक नाम दिया बोनसाई

पहले पेड़ से टहनी को काटा,
कई टुकड़ों में फिर उसको बांटा
गाड़ मिट्टी में कर दी सिंचाई
और नाम दिया बोनसाई

दिन बीते, महीनों बीते
उस दिन हम प्रकृति से जीते
जब टहनी में कोपल आई
और नाम दिया बोनसाई

छोटा गमला लिया थोड़ी मिट्टी भी ली
थोड़ा मौरंग लिया थोड़ी गिट्टी भी ली
फिर गमले में कलम सजाई
और नाम दिया बोनसाई

पत्ती आने लगी, शाखा भरने लगी 
कोने कोने में बगिया सजने लगी 
लेने आने लगे सौदाई 
और नाम दिया बोनसाई 

कुछ सौ में बिके कुछ हज़ार में 
वट पीपल भी बेचा बाज़ार में 
ख़ूब होने लगी फिर कमाई 
और नाम दिया बोनसाई

वट सावित्री का दिन आया 
बौने पौधे को ख़ूब सजाया 
की पूजा औ फेरी लगाई 
और नाम दिया बोनसाई 

मैंने माँगी दुआ विटप रोने लगा 
और रो करके मुझसे यूँ  कहने लगा 
क्यों की तुमने मेरी छँटाई 
और नाम दिया बोनसाई 

पहले काटा मुझे फिर बौना किया 
मुझे रहने को छोटा सा कोना दिया 
तुम्हें मुझपे तरस न आई  
और नाम दिया बोनसाई 

कितने निष्ठुर हो तुम नर नारी 
हो चलाते कुल्हाड़ी कटारी
अब साँसों की देते दुहाई 
और नाम दिया बोनसाई 

 **जिज्ञासा सिंह**