जयमाल गीत

करि सोलह सिंगार, पिया जी की राह निहारूँ ।

दर्पण देखूँ, देखि लजाऊँ ।
अपने पिया की छवी सजाऊँ ।
जैसे राजकुमार, पिया जी की राह निहारूँ ।।

सिर पे पगड़ी, बाँधी होगी ।
टीका चंदन रोली होगी ।।
अँखियाँ करेंगे कजरारि, पिया जी की राह निहारूँ ।।

हाथी घोड़ा साज पिया जी ।
सोलह कहारों वाली पलकी ।।
बैठ के आएँगे द्वार, पिया जी की राह निहारूँ ।।

मुझको निहारेंगे साजन जी ।
दिल में बसाएँगे साजन जी ।।
डालेंगे जयमाल, पिया जी की राह निहारूँ ।।

हमरी बिंदिया, हमरा कजरा ।
हमरी नथिया, हमरा गजरा ।।
उनसे सब सिंगार, पिया जी की राह निहारूँ ।।

करि सोलह सिंगार, पिया जी की राह निहारूँ ।।

**जिज्ञासा सिंह**

छब्बिस जनौरी (अवधी लोकगीत)

छब्बिस जनौरी के दिनवा,
सखी री एक लडुआ खिलाय दियो रे ।

यही रे दिना गणतंत्र बना था
झंडा हमारा अकास छुआ था
लड़िकन का तनी ई बताओ फौज
की गाथा सुनाय दियो रे ।

केतने सहीद भए केतने हेराने
केतने बिछुड़ गए हमहूँ न जाने
घरा वाले रहिया अगोरें सखी री
यहि देसवा पे मिट गए रे ।

बड़ी मुस्किल से आजादी मिली थी
कीमत बड़ी ही चुकानी पड़ी थी
केहू न बच्चन का बतावे सेनानी
कैसे देसवा बचाय गए रे ।

स्कूल विद्या से कुछू नाहीं जनिहैं
खाली कमैहैं औ घर का चलैहैं
मास्टर औ मुंसी न बतावें सखी रे
माँ के फर्ज निभाय दियो रे ।

हम तुम हैं माँ, सखी भारत भी माता
केहू नाहीं भक्ती देस की गाता
अपने से पहिले आपन देसवा
सखी री यही लड़िकन बताय दियो रे

छब्बिस जनौरी के दिनवा,
सखी री एक लडुआ खिलाय दियो रे ।

शब्द: अर्थ
लडुआ: लड्डू
अकास: आसमान  
हेराने: खो जाना
अगोरें: इंतजार करना
लड़िकन,बच्चन: बच्चे
मुंसी: टीचर

**जिज्ञासा सिंह**

जच्चा गीत (बच्चे के जन्म का गीत)

मेरी मित्र के दादी बनने पर लिखा गया गीत:

लाल के हुए मेरे लाला, 
पिया जी तुम्हें दादा कहेगा ।
लागे है कृष्ण गोपाला, 
पिया जी तुम्हें दादा कहेगा ।।

भोर में सूरज सा चमकेगा, 
दिन में उजाला करेगा...
पिया जी तुम्हें दादा कहेगा ।

वो गुलशन का फूल होगा, 
खिल के गुलाब सा महकेगा...
पिया जी तुम्हें दादा कहेगा ।

अंबर जैसा ऊँचा होगा, 
चंदा सा चमकेगा....
पिया जी तुम्हें दादा कहेगा ।

अपने घर का राजा होगा, 
शीश मुकुट दमकेगा....
पिया जी तुम्हें दादा कहेगा ।

कान्हा जैसा प्यारा होगा, 
राम सा राजा बनेगा....
पिया जी तुम्हें दादा कहेगा ।

**जिज्ञासा सिंह**

विवाह में प्रकृति का निमंत्रण (अवधी बियाहू गीत)


मेड़े मेड़े घुमि घूमि पौध लगाँवव, पौध जे जाय हरियाय ।
उपरा से झाँकय सुरज की जोतिया, नीचे धराति गरमाय ।।

आओ न सुरजा चौक चढ़ि बैठौ, देहूँ मैं बेनिया डोलाय ।
तपन धुजा की मिटाओ मोरे सुरजा, मेह का दीजो बोलाय ।।

होत भोर मैं सुरजा मनाएंव, सांझ बदरिया डेरा डारि ।
झिनि झिनि बूंदन बरसे बदरिया, घिरि आई कारी अंधियारि ।

आधी रात घन बरसन लागे, बिजुरी कड़के बड़ी जोर ।
भोर भए मोरी भरि गई कियरिया, पनिया भरा है चारिव ओर

खेत मेड़ हरियाय गए राजा, धरती बिहंसि हरसाय ।
अंचरा पसारे रानी सुरजा निहारें, सुरजा बदर छुप जाएं ।।

**जिज्ञासा सिंह**
शब्द: अर्थ 
धराति: धरती 
लगाँवव: लगाना 
हरियाय: हरा होना 
सुरजा: सूरज
बेनिया: हाथ का पंखा
धुजा: शरीर
झिनि झिनि: छोटी छोटी

विवाह गीत..(अवधी बियाहू )



दूर देस मोरी बेटी गई हैं:२
पढ़न बड़ी रे किताब ।
सखी रे कैसे ब्याह रचाऊँ ।।

अट्ठरा बरस बेटी होन को आईं:२
बाबा ने ठाना बियाह ।
सखी रे कैसे ब्याह रचाऊँ ।।

रोय रोय बेटी ने घर भर दीन्हा: २
हम तौ पढ़न दूर जाब ।
सखी रे कैसे ब्याह रचाऊँ ।।

बाप न भेजा औ बाबा न भेजा: २
हम करिके भेजा बिसवास ।
सखी रे कैसे ब्याह रचाऊँ ।।

सबही के बेटी बियहि गईं ससुरे: २
हमरी पढन दूरदेस ।
सखी रे कैसे ब्याह रचाऊँ ।।

कोई मारे बोली तौ कोई ठिठोली: २
करौ जल्दी बेटी बियाह ।
सखी रे कैसे ब्याह रचाऊँ ।।

हम कही बेटी जौ पढ़ि कुछ बनिहैं: २
मिलि जैहैं सुघर दमाद ।
सखी रे फिर ब्याह रचाऊँ ।।

**जिज्ञासा सिंह**
शब्द: अर्थ 
बड़ी किताब: उच्च शिक्षा 
बिसवास: विश्वास 
ठिठोली: मज़ाक़ 
ससुरे: ससुराल 
सुघर: अच्छा, पढ़ा लिखा कमाऊ 

महावर, नाखुर गीत (अवधी लोकगीत)

रगरि-रगरि धोवे गोड़ कहारिन,
अरे नाउन आई बोलाइ, राम जी कै आजु है नाखुर ।।

दूर देस सखि रंग मंगायंव, 
मेहंदी मंगायंव मारवाड़, राम जी कै आजु है नाखुर ।।

केहू कहे चिरई, तव केहू कहे सुग्गा,
केहू कहे चंदा बनाओ, राम जी कै आजु है नाखुर ।।

सोनेन की नाऊ लाए हैं नहन्नी,
चांदी सींक सलाई, राम जी कै आजु है नाखुर ।।

रचि रचि रंग भरे है नउनिया,
मेहंदी लगाई मनुहारि, राम जी कै आजु है नाखुर ।।

दसरथ दीन्हें हैं अनधन सोनवा, 
कौसल्या मोतियन हार, राम जी कै आजु है नाखुर ।।

झूमि झूमि नाऊ लेहि बलैया,
नाउन नाचें झलकारि, राम जी कै आजु है नाखुर ।।

जिज्ञासा सिंह
शब्द    अर्थ
नाखुर :  नाखून कटना
गोड़  :   पैर
चिरई : चिड़िया
सुग्गा : तोता
नहन्नी : नाखून काटने का औजार
बलैया : दुआ, आशीर्वाद
झलकारि : झूम झूम, मगन हो

मेला में पत्नी का बिछुड़ना (लोकगीत)


मोरी धनियाँ मेला म हेराय गईं ।

अगवा से हम चलैं पीछे मोरी धनियाँ,
न जाने कैसे डगरिया भुलाय गईं ।

पहली बार धना घर से हैं निकरी,
भीर देखते बहुत घबराय गईं ।

नदिया नहरिया धनै बहु भावे
बीच गंगा म डुबकी लगाय गईं ।

लड्डन हलवैया बनावे मिठैया
रसही जलेबी देखि ललचाय गईं ।

खस्ता बसाता उन्हें बहु भावे,
एक दर्जन गपागप खाय गईं ।

सुरमा दुकनियाँ क रहि रहि ताकें,
दाम सुनते बहुत खिसियाय गईं ।

लड़िकन खिलौना सबहि कुछ बेसहैं,
लै के पिपिहिरी वे पीं पीं बजाय गईं ।l

**जिज्ञासा सिंह**
शब्द: अर्थ
धना, धनियाँ: पत्नी
हेराय: खोना, बिछुड़ना
बेसहैं: खरीदना
पिपहिरी: बांसुरी, सींटी के जैसा वाद्ययंत्र
रसही: रसीली
लड़िकन: बच्चे
बसाता: गोलगप्पे