मेला में पत्नी का बिछुड़ना (लोकगीत)


मोरी धनियाँ मेला म हेराय गईं ।

अगवा से हम चलैं पीछे मोरी धनियाँ,
न जाने कैसे डगरिया भुलाय गईं ।

पहली बार धना घर से हैं निकरी,
भीर देखते बहुत घबराय गईं ।

नदिया नहरिया धनै बहु भावे
बीच गंगा म डुबकी लगाय गईं ।

लड्डन हलवैया बनावे मिठैया
रसही जलेबी देखि ललचाय गईं ।

खस्ता बसाता उन्हें बहु भावे,
एक दर्जन गपागप खाय गईं ।

सुरमा दुकनियाँ क रहि रहि ताकें,
दाम सुनते बहुत खिसियाय गईं ।

लड़िकन खिलौना सबहि कुछ बेसहैं,
लै के पिपिहिरी वे पीं पीं बजाय गईं ।l

**जिज्ञासा सिंह**
शब्द: अर्थ
धना, धनियाँ: पत्नी
हेराय: खोना, बिछुड़ना
बेसहैं: खरीदना
पिपहिरी: बांसुरी, सींटी के जैसा वाद्ययंत्र
रसही: रसीली
लड़िकन: बच्चे
बसाता: गोलगप्पे

18 टिप्‍पणियां:

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    1. बहुत बहुत आभार आपका अभिलाषा जी, आपको मेरा सादर नमन ।

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  2. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार
    (23-11-21) को बुनियाद की ईंटें दिखायी तो नहीं जाती"( चर्चा अंक 4257) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है..आप की उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ायेगी .
    --
    कामिनी सिन्हा

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  3. बहुत बहुत आभार कामिनी जी, चर्चा मंच पर इस लोकगीत के चर्चा के लिए आपको मेरा सादर नमन एवम वंदन । आपको और चर्चा मंच को हार्दिक शुभकामनाएं ।

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  4. बहुत ही सुंदर! पढ़कर लबों पर मुस्कान खुद बहुत खुद आ गयी 😊

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    1. प्रिय मनीषा ये पिक्चर सरयू मेला की है,अपनी दादी का गीत सुनकर हँसी तो आएगी ही । ये सच घटना पर आधारित गीत है, अपनी तरफ तो ऐसे लोग आज भी मिलते हैं,जिनकी पत्नियाँ आज भी मेला में खो जाती हैं। मैं बड़े आनंद से सुनती हूं ऐसी कहानियां । तुम्हें बहुत सारा स्नेह 😀😀

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  5. बहुत बहुत आभार आपका आदरणीय ।

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  6. बहुत सुन्दर !
    धनिया को खोजने वाले उसे चूड़ी वाले की दुकान पर तो जा कर देखें !

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    1. अरे क्या बात है ?
      मैं ये चूड़ी वाले को कैसे भूल गई ? चूड़ी,और गोदना गोदवाना तो मेलहरु औरतों का पहला शौक है, मैंने दस बरस की उम्र में ये सब देखा है लेकिन आज तक नहीं भूली हूं । और न भूल पाऊंगी गोदना गोदवाने का दृश्य 😂😂😂😂

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  7. 😀😀 बहुत बढ़िया प्रिय जिज्ञासा जी। ये रसीला और मनमोहक गीत पढ़कर बहुत अच्छा लगा। लोकजीवन के सरल लोगों की ये सरस अभिव्यक्ति आत्म-आनंद की द्योतक है। धनिया के विलक्षण गुण तो यही कहते हैं कि भीड़ को देखकर नहीं, ना ही गंगा मैया में डुबकी लगाने से, धनियां तो छिपी है जलेबी, गोलगप्पे खाकर पतिदेव का बजट बढ़ाने से ।😀😀😀😀 हार्दिक शुभकामनाएं इस रोचक सृजन के लिए हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई आपको ❤️❤️🌷🌷

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  8. तमाम जिम्मेदारियों के बीच,इस मेलहरू गीत को समय देने के लिए आपका जितना शुक्रिया करूं कम है,आपको मेरा नमन 😀🙏

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  9. लोक गीतों का अपना ही तिलिस्म है ...
    बांधे रखता है हर पंक्ति में ... आंचलिक महक सहज मन को खींच लेती है ...

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  10. आपका बहुत बहुत आभार आदरणीय सर, आपकी प्रशंसा ने रचना को सार्थक बना दिया । सादर नमन🙏💐

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