इस ब्लॉग में मैंने स्वरचित लोकगीतों को उद्घृत किया है ,जो उत्तर भारतीय संस्कृति का अहम हिस्सा हैं -
बैरी बदरवा
मेरे नैनों में श्याम बस जाना 🌺
शिव जी का भजन🌺
मैं मृग छाला ले आई
और प्रभु का आसन बिछाई
चरण गंगा के जल से पखारे,
मस्तक पर गंगा धारे ॥
शीश चंदा बड़ा है निराला,
गले सोहे है सर्पन की माला ।
हाथों से डमरू बजा रे,
मस्तक पर गंगा धारे ॥
लगा धरती पे अद्भुत मेला,
प्रभु वंदन की सुंदर बेला
माह सावन का धूम मचा रे,
मस्तक पर गंगा धारे ॥
ठाढे हैं सकल नर नारी,
त्रिपुरारी रहे निहारी ।
बर माँगे है सीस नवा रे,
मस्तक पर गंगा धारे ॥
**जिज्ञासा सिंह**
चूड़ी है रंगबिरंगी
अरे रामा चूड़ी है रंगबिरंगी
चुनरिया धानी रे हारी ।
मेरे माथे सजी है बिंदिया,
नथनिया न्यारी रे हारी ॥
मैं पहन के निकली अँगनवाँ
हैं द्वारे से आए सजनवाँ
मैं देख उन्हें शरमाई रामा
अरे रामा पुरवा चले बयार
पिया पे जाऊँ वारी रे हारी ॥
अरे रामा चूड़ी है रंगबिरंगी
चुनरिया धानी रे हारी ॥
मोरी चूड़ी खनखन बोले
मोरा जियरा रहि रहि डोले
मोरी निमियाँ पे बोले कोयलिया रामा
अरे रामा पपिहा गावे मल्हार
बिहंसें सखि प्यारी रे हारी ॥
अरे रामा चूड़ी है रंगबिरंगी
चुनरिया धानी रे हारी ॥
अब सावन झूले पड़ेंगे
हम सखियन के संग झूलेंगे
हम मारेंगे पेंग अकासी रामा
अरे रामा जाएँगे नभ के पार
लचक जाए डारी रे हारी ॥
अरे रामा चूड़ी है रंगबिरंगी
चुनरिया धानी रे हारी ॥
**जिज्ञासा सिंह**
फौज नौकरिया रे हारी..कजरी
अरे रामा पियवा चले लद्दाख़,
फौज नौकरिया रे हारी ।
मैंने भेजा है अरती उतार,
फौज नौकरिया रे हारी ॥
मैं रचि रचि भोजना बनाई
और अपने पिया का खिलाई
मैं लौंगा इलायची मँगाई रामा
अरे रामा खाते पिया मोरे पान
कि होंठवा ललारी रे हारी ॥
अरे रामा पियवा चले लद्दाख़,
फौज नौकरिया रे हारी ॥
पिया वार मेमोरियल जैहैं
और फ़ोटू मोहे पठैहैं
हम फ़ोटू का सबरी मढ़ैहैं रामा
अरे रामा घर मा दैहौं टाँग
रोज रोज देखिहौं रे हारी ॥
अरे रामा पियवा चले लद्दाख़,
फौज नौकरिया रे हारी ॥
पिया धरती का बहुत मोहावें
उसै अपनी अम्मा बतावें
मैं बलि बलि जाऊँ सुन सुन रामा
अरे रामा देसवा से बहुत पियार
करेजवा वारी रे हारी ॥
अरे रामा पियवा चले लद्दाख़,
फौज नौकरिया रे हारी ॥
मैं लड़िकन का अपने बताऊँ
यहि देसवा से प्रेम सिखाऊँ
मैं सरहद की फोटु दिखाऊँ रामा
अरे रामा उन्हऊँ का भेजौं लद्धाख
देस रखवारी रे हारी ॥
अरे रामा पियवा चले लद्दाख़,
फ़ौज नौकरिया रे हारी ॥
**जिज्ञासा सिंह**
एक पाती लिखूँगी मैं आज..सावन गीत
हरे हरे सावना ।
मोरी अम्मा में जिया मोरा लाग
हरे हरे सावना ॥
आजु सपन मैं देखी बबुल जी का घर
सब अँगन में बैठे हैं साँझ पहर
बाबा दादी बुलायें हम दौड़ी हैं आएँ
मन खोल लिखूँ हिय बात
हरे हरे सावना ॥
मेरे सपन में बचपन की सखियाँ दिखैं
मेरे गोद में गुड्डा औ गुड़िया दिखैं
मोरे गुड्डा औ गुड़िया का ब्याह रचा
मोरे द्वारे पे आई बरात
हरे हरे सावना ॥
अब काव लिखूँ यहि पाती सखी
मन हर्षित है मन होत दुखी
मोरे ससुरे म नैहर की कौन सुने
आजु जियरा है मोरा उदास
हरे हरे सावना ॥
मैं बाबुल लिखूँ या बिरन लिखूँ
यहि सवन न आए अब चैन लिखूँ
कोई मोहे बताए काव काव लिखूँ
मोरे जियरा में सौ सौ बात
हरे हरे सावना ॥
एक पाती लिखूँगी मैं आज
हरे हरे सावना ।
मोरी अम्मा में जिया मोरा लाग
हरे हरे सावना ॥
**जिज्ञासा सिंह**




