चूड़ी है रंगबिरंगी

 

अरे रामा चूड़ी है रंगबिरंगी 

चुनरिया धानी रे हारी 

मेरे माथे सजी है बिंदिया,

नथनिया न्यारी रे हारी 


मैं पहन के निकली अँगनवाँ

हैं द्वारे से आए सजनवाँ

मैं देख उन्हें शरमाई रामा

अरे रामा पुरवा चले बयार

पिया पे जाऊँ वारी रे हारी 


अरे रामा चूड़ी है रंगबिरंगी 

चुनरिया धानी रे हारी 


मोरी चूड़ी खनखन बोले

मोरा जियरा रहि रहि डोले

मोरी निमियाँ पे बोले कोयलिया रामा

अरे रामा पपिहा गावे मल्हार

बिहंसें सखि प्यारी रे हारी 


अरे रामा चूड़ी है रंगबिरंगी 

चुनरिया धानी रे हारी 


अब सावन झूले पड़ेंगे

हम सखियन के संग झूलेंगे

हम मारेंगे पेंग अकासी रामा

अरे रामा जाएँगे नभ के पार

लचक जाए डारी रे हारी 


अरे रामा चूड़ी है रंगबिरंगी 

चुनरिया धानी रे हारी 


**जिज्ञासा सिंह**

14 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर कजरी लिखा है आपने बहन👌👌

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  2. बहुत बहुत आभार आदरणीय सर।

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  3. डॉ विभा नायक19 जुलाई 2022 को 4:40 am

    आपकी कविता में तो पूरा सावन ही उतर आया है। बहुत सुंदर🌷

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    1. बहुत आभार विभा की ।आपकी उपस्थिति खुशी दे गई । हार्दिक स्वागत।

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  4. डॉ विभा नायक19 जुलाई 2022 को 4:54 am

    जिज्ञासा जी संजय जी के ब्लॉग पर आपकी गौरैया पर लिखी कविता पढ़ी। बहुत सुंदर। बधाई आपको। आपके गीत बहुत सुंदर हैं।

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    1. बहुत आभार आपका विभा जी । समय मिले तो मेरे कविता के ब्लॉग जिज्ञासा की जिज्ञासा पर पधारें । आपका हार्दिक अभिनंदन है ।

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  5. बहुत ही सुंदर सावन गीत ! आपका ये गीत पढ़ र मुझे बचपन का गीत याद आ जो हम झूला झूलते समय गाते थे!
    अरे रामा डलिया भरी सरसोइया बेचन चली जाबे रे हारी..... ! बहुत मस्ती करते थे हम बचपन में झूले पर ही खाना खाते थे सारा दिन झूले पर ही बिताते थे 😄😊😊😄😆

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  6. सही कहा प्रिय मनीषा। तुम्हारी टिप्पणी मन को भा गई ।सच मेरा भी बचपन ऐसे ही बीता है ।

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