तर्ज.. वंशी तो बाजी मेरे रंग महल में..
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सपने में आज सखी तरुवर देखा
तरुवर के नीचे खेलें बालक देखा
तरुवर के नीचे छहाएँ, सखी नन्हें बालक
तरुवर से हँस बतियाएँ, सखी नन्हें बालक
तरुवर की डाल चढ़ जाएँ, सखी नन्हें बालक, अँखियन देखा
सपने में आज.......
तरुवर से फूल पत्ती पाएँ, सखी नन्हें बालक
तरुवर से फल सब्जी खाएँ, सखी नन्हें बालक
तरुवर पे लटके झूला झूले सखी नन्हें बालक,अँखियन देखा
सपने में आज.......
तरुवर की लकड़ी की गाड़ी दौड़ाएँ बालक
तरुवर की लकड़ी की नाव चलाएँ बालक
तरुवर की धनुष पे तान चढ़ाएँ, बालक, अँखियन देखा
सपने में आज.......
तरुवर की पाटी पे क ख और ग घ लिखें
तरुवर की कुर्सी पे बैठ किताबें पढ़ें
तरुवर की वीणा पे गान मधुर गावें, अँखियन देखा
सपने में आज सखी.......
ऐसे में प्यारी सखी,आओ न हाथ मिलाएँ
सब मिल के पेड़ लगाएँ, हरियाली हम फैलाएँ,
अपने बच्चों के लिए धरती को खूब सजाएँ, खींचें एक रेखा
सपने में आज सखी.......
मेरे स्वपन मेरी संखियों को भाने लगे
हम सब मिल जुल के पेड़ लगाने लगे
बच्चों के लिए हरियाली फैलाने लगे,जंगल मुस्काने लगे
धरती माँ मुसकायीं,सज धज हर्शायीं जैसे सुरेखा
सपने में आज सखी......
**जिज्ञासा सिंह**