मेरी सौ सौतानियाँ


तर्ज: नगरी नगरी द्वारे द्वारे ढूँढूँ रे सांवरिया

साजन को घेरे रहती हैं, मेरी सौ सौतनियाँ ।
देख देख मैं जल भुन जाऊँ, सुलगूं बन अगिनियाँ ॥

सुबह सवेरे चाय बनाऊँ, ले के जाऊँ पिय के पास।
देखि देखि सौतन का परचम, मनवा मेरा रहे उदास ॥
अखबारों में मुंडी डारे, हाथ में कितबिया ॥

बगल रखा मोबाइल घन घन,घंटी मारे मिनट मिनट पर ।
सूप्रभात का मैसेज लेके, आवैं गोरी व्हाट्सएप पर ॥
जैसे घूरूँ साजन बोलें, हैं बीमा कंपनियाँ ॥

हाय बेरहम मित्रमंडली, रोज सवेरे आ जाती है ।
अदरक लेमनग्रास की चइया,भरभर के कप पी जाती है॥
गप्प मारते जब वे हँसके, तड़पूँ ज्यों मछरियाँ ॥

पहले पेपर, मित्र थे सौतन, अब मोबाइल फ़ोन है ।
डाटा, नेट ज्यों खत्म हुआ, मुआँ वाई फाई ऑन है।।
फोन टच सहलावें ज़ालिम, लोटे है नागिनियाँ ।।

**जिज्ञासा सिंह**

16 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ख़ूब जिज्ञासा !
    वैसे यही कविता अपनी पत्नी के लिए कोई पति भी लिख सकता है.

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    1. आपका विनम्र आभार ।
      पति की तरफ से भी जल्दी ही आपको पढ़ने को मिलेगी..आपको सादर अभिवादन।

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  2. आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल बुधवार (18-05-2022) को चर्चा मंच    "मौसम नैनीताल का"    (चर्चा अंक-4434)     पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य यह है कि आप उपरोक्त लिंक पर पधार कर चर्चा मंच के अंक का अवलोकन करे और अपनी मूल्यवान प्रतिक्रिया से अवगत करायें।
    -- 
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'    
    --

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  3. आदरणीय शास्त्री जी, सादर प्रणाम।
    गीत को चर्चा मंच में शामिल करने के लिए आपका आभार और अभिनंदन।मेरी हार्दिक शुभकामनाएं ।

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  4. क्या बात है प्रिये 👌👌👌👌😀😀😀

    सुन सखी काहे को जिया जलावै,
    जियो और जीने दो की नीति
    काहे नहीं अपनावै?
    साजन घर और घरनी के
    कहाँ सौतन के बस में आवै
    मिले बाहर या फुनवा में
    घर तो ना लेके आवै
    आनी और जानी बाहर वाली
    घरवाली तो एक कहावै
    दिन-भर भले कहीं भी घूमे
    हर साँझ तेरे घर आवै!!!
    😀😀😀😀🙏

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  5. वाह गजबे हाजिरजवाबी।मजा आ गया। सही कह रही हैं,
    लेकिन ई फुनवा तो कौनो न कौनो रूप म दुसमनी निभा ही देता है 😃😃🤩🤩😍😍

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  6. बहुत बहुत आभार मनोज जी ।

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  7. बहुत बहुत आभार आपका अनुराधा जी आपका ।

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