इस ब्लॉग में मैंने स्वरचित लोकगीतों को उद्घृत किया है ,जो उत्तर भारतीय संस्कृति का अहम हिस्सा हैं -
कतकी नहान (पूर्णमासी मेला)
देवी गीत..
(१) चुपके चुपके आईं, भवानी मोरे अँगनवाँ
भोर भये रवि आने से पहले,
देख नहीं मैं पाई, भवानी मोरे अँगनवाँ
बाग हँसन लगे, कमल खिलन लगे
कलियाँ हैं लहराईं, भवानी मोरे अँगनवाँ
गोदिया बालक हँसि मुस्काने
मोहें नज़र नहीं आईं,भवानी मोरे अँगनवाँ
व्याकुल मन मोरा माँ को ढूँढ़े
दिख जाए परछाईं, भवानी मोरे अँगनवाँ
मन देखा, अंतर्मन देखा
हृदय बीच मुस्काईं, भवानी मोरे अँगनवाँ
नेह औ श्रद्धा की छवि सुंदर
नैनन बीच समाईं, भवानी मोरे अँगनवाँ
चुपके-चुपके आईं, भवानी मोरे अँगनवाँ
(२) सारे नगर मची धूम जगदंबे आइँ
गाँव-शहर मची धूम माँ दुर्गे आइँ
पेड़ पकड़िया सब हर्षाने
चलीं हवाएँ झूम-झूम जगदंबे आइँ
नदियाँ बहन लगीं कुआँ भरन लगे
बादल बरसा घूम-घूम जगदंबे आइँ
अपनी अँटरिया पे चढ़ि-चढ़ि देखूँ
जयकारे नभ रहे चूम जगदंबे आइँ
आगे-आगे मैया पीछे संसार चले
अगल-बगल चले झुंड जगदंबे आइँ
जनगण मैया की अरती उतारें
बाजन बाजे बूम-बूम, जगदंबे आइँ
सारे नगर मची धूम जगदंबे आइँ ॥
**जिज्ञासा सिंह**
सोहर गीत..(हास्य व्यंग)
बैरी बदरवा
मेरे नैनों में श्याम बस जाना 🌺
शिव जी का भजन🌺
मैं मृग छाला ले आई
और प्रभु का आसन बिछाई
चरण गंगा के जल से पखारे,
मस्तक पर गंगा धारे ॥
शीश चंदा बड़ा है निराला,
गले सोहे है सर्पन की माला ।
हाथों से डमरू बजा रे,
मस्तक पर गंगा धारे ॥
लगा धरती पे अद्भुत मेला,
प्रभु वंदन की सुंदर बेला
माह सावन का धूम मचा रे,
मस्तक पर गंगा धारे ॥
ठाढे हैं सकल नर नारी,
त्रिपुरारी रहे निहारी ।
बर माँगे है सीस नवा रे,
मस्तक पर गंगा धारे ॥
**जिज्ञासा सिंह**
चूड़ी है रंगबिरंगी
अरे रामा चूड़ी है रंगबिरंगी
चुनरिया धानी रे हारी ।
मेरे माथे सजी है बिंदिया,
नथनिया न्यारी रे हारी ॥
मैं पहन के निकली अँगनवाँ
हैं द्वारे से आए सजनवाँ
मैं देख उन्हें शरमाई रामा
अरे रामा पुरवा चले बयार
पिया पे जाऊँ वारी रे हारी ॥
अरे रामा चूड़ी है रंगबिरंगी
चुनरिया धानी रे हारी ॥
मोरी चूड़ी खनखन बोले
मोरा जियरा रहि रहि डोले
मोरी निमियाँ पे बोले कोयलिया रामा
अरे रामा पपिहा गावे मल्हार
बिहंसें सखि प्यारी रे हारी ॥
अरे रामा चूड़ी है रंगबिरंगी
चुनरिया धानी रे हारी ॥
अब सावन झूले पड़ेंगे
हम सखियन के संग झूलेंगे
हम मारेंगे पेंग अकासी रामा
अरे रामा जाएँगे नभ के पार
लचक जाए डारी रे हारी ॥
अरे रामा चूड़ी है रंगबिरंगी
चुनरिया धानी रे हारी ॥
**जिज्ञासा सिंह**




