मैने गमले में बगिया लगाई
एक नाम दिया बोनसाई
पहले पेड़ से टहनी को काटा,
कई टुकड़ों में फिर उसको बांटा
गाड़ मिट्टी में कर दी सिंचाई
और नाम दिया बोनसाई
दिन बीते, महीनों बीते
उस दिन हम प्रकृति से जीते
जब टहनी में कोपल आई
और नाम दिया बोनसाई
छोटा गमला लिया थोड़ी मिट्टी भी ली
थोड़ा मौरंग लिया थोड़ी गिट्टी भी ली
फिर गमले में कलम सजाई
और नाम दिया बोनसाई
पत्ती आने लगी, शाखा भरने लगी
कोने कोने में बगिया सजने लगी
लेने आने लगे सौदाई
और नाम दिया बोनसाई
कुछ सौ में बिके कुछ हज़ार में
वट पीपल भी बेचा बाज़ार में
ख़ूब होने लगी फिर कमाई
और नाम दिया बोनसाई
वट सावित्री का दिन आया
बौने पौधे को ख़ूब सजाया
की पूजा औ फेरी लगाई
और नाम दिया बोनसाई
मैंने माँगी दुआ विटप रोने लगा
और रो करके मुझसे यूँ कहने लगा
क्यों की तुमने मेरी छँटाई
और नाम दिया बोनसाई
पहले काटा मुझे फिर बौना किया
मुझे रहने को छोटा सा कोना दिया
तुम्हें मुझपे तरस न आई
और नाम दिया बोनसाई
कितने निष्ठुर हो तुम नर नारी
हो चलाते कुल्हाड़ी कटारी
अब साँसों की देते दुहाई
और नाम दिया बोनसाई
**जिज्ञासा सिंह**