चूनरी है हरी पहनी,माँग सेंदुर लगाया है,
मैंने आँखों में अपने आज, वो सुरमा लगाया है ।
जो साजन जी मेरे जाकर, बरेली से ले आए थे,
औ मोती से जड़ा कंगन, वो जयपुर से मंगाए थे ।।
मेरे माथे सजा झूमर, पिया का जी लुभाता है,
कान में झूलता झाला, गीत यूँ गुनगुनाता है ।
कि प्राणों से पियारी तुम, सखी हो, सहचरी मेरी,
तुम्हारे सामने अर्पण, हमारे प्रेम की ढेरी ।।
वो ढेरी आत्मा के सूत्र को, तुमसे पिरोती है,
प्रेम में डूबकर सजनी, सजन में आज खोती है ।
तीज त्योहार रंगों से, सजाए गोरी का दामन,
सजेगी आज फिर सजनी,सजाएंगे उसे साजन ।।
बड़े अरमान से सासू ने, तोहफ़ा ये दिया मुझको,
कहा आशीष देकर तुम,बड़ी प्यारी हो हम सबको ।
सदा गौरा के जैसे प्रेम, तुमको दें महाशंकर,
भरा आँचल रहे तेरा, ख़ुशी झूमे तेरे दर पर।।
**जिज्ञासा सिंह**
