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अवधी लोकगीतों में सुभाष बाबू

मेरी चाचीदादी द्वारा रचित लोकगीत, महान देशभक्त आदरणीय नेताजी सुभाष चंद्र बोस के जन्मदिन पर पेश कर रही हूँ..एक गाँव की भोली भाली महिला की सच्ची श्रद्धांजलि..

बाबू सुभाषचंद्र बोस हमारी गलियों से निकल गए 

बागों में आए बगीचों में आए 
कर के वो मलिया से बात 
मलिनिया से छुप के निकल गए 
बाबू...

कुअना पे आए जगतिया पे आए 
कर के वो महरा से बात 
महरिनिया से बच के निकल गए 
बाबू...

तालों पे आए नहरिया पे आए 
करके वो धोबी से बात 
धोबिनिया से छुप के निकल गए 
बाबू...

महलों में आए दुमहलों में आए 
कर के वो राजा से बात 
औ रानी से बच के निकल गए 
बाबू...

**जिज्ञासा सिंह**